रविवार, 29 जून 2025

सुनो पथिक

 हे पथिक |

ठहरो सुनो तुम 

दो ऋतुओं की संगत गाथा 

विधु देता था बूंद सुद्धा की 

तारों की सभा लगी थी 

वसुधा भी  शांत खड़ी थी

शीट नहाए पत्र पुष्प सब 

थर थर काँप रहे वन उपवन 

प्रकृति पर  शिविर लगाए शिशिर 

बर्फीली चादर ने छा कर 

दिया सृजन का नाव संकेत 

नवल भाव अंकुर फूटेंगे 

नाव कोंपल ,नाव पत्र खिलेंगे 

तब एक मादक ऋतु आएगी 

सुरभित सरल सुवासित 

बसंती आनंद हुलसित 

लिखेगी एक नवल कविता ||









मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

 मैँ रेगीस्तानी पेड़ 

 सुबह से शाम हो जाती है 

की आज तुम कुछ कहोगे 

बात बीच मे छोड़ कर आज तुम छुप नहीं रहोगे 

मुझे बहुत कुछ जानना है

आकाश की ऊंचाई नापनी हैं

समुद्र की गहराई भाँपनी हैं 

पत्ते सूख रहे हैं ,डाली अभी हरी है

 जीवन को जीने जैसा बनाना है 

ये रेगीस्तानी पेड़ खूब खिलना चाहता है 

कुछ बूंद पड़ने तो दो 

shakuntla mishra 



गुरुवार, 30 नवंबर 2023

साथ चलो

 मैंने तुम्हें पुकारा नहीं 

अकेली ही चली 

मन की दुविधा मुक्त नहीं होने देती 

पर चाहा है की साथ चलो 

आंधी ,झंझा सब  पार करते चलती रही 

राह मे मिले कलरवित पक्षी ,निनादित नदियाँ 

कुछ दरख्त जो  मजबूत खड़े थे 

अपनी हरी डालियों ,फूलों ओर फलों से भरे 

सबसे बेखबर ,खुश 

मैँ उनको भी पीछे छोड़ चलती गई 

सूरज डूबता देखा  रुकना ही पड़ा 

सुबह फिर चलना ही था 

कभी मिलूँगी खुद से जब 

तों कौन फिर बताएगा 

मेरा वजूद है काहाँ /?

पुकार तो नहीं ,पर चाहा जरूर 

तुम मेरे साथ चलो ||

गुरुवार, 16 नवंबर 2023

चिट्ठी जो डाकखाने तक नहीं गई

कुछ चिट्ठीयां ऐसी भी होती हैं 

जो भेजी नहीं जाती कही वे किसको लिखी जाती हैं ?

वे खुद ही पढ़ती हैं खुद को ,ओर खुद ही समझती हैं 

वे चिट्ठियाँ ! समय के साथ विसार दी  जाती हैं |

पुनः आनंद  के दिन आते ही बंद हो जाती हैं वे 

एक दिन फिर लिखनी पड़ती हैं एक चिट्ठी 

फिर पुरानी भी खुल जाती है पन्ने दर पन्ने 

कुछ पन्ने पूरे हो चुके होते हैं 

कुछ के ड्राफ्ट कुदरत ने भर दिए होतें हैं 

कुछ खाली होती हैं 

ये खाली चिट्ठीयां >>> बेचैनी बन कर  

नसों मे दौड़ती हैं ,कुछ मे तो शीर्षक ही होते हैं 

उनका अनुमान लगाया जाता है बस 

हो सकता उसमे कुछ अच्छा लिखा जाए                    

जो बटवृक्ष की तरह हो 

उनका विस्तार किसी को खुशी दे 

दुनिया सबसे बड़ा कलमकार तो लिख चुका होगा 

बस पढ़ ना बाकी है |

अहो राम ! वही नहीं पढ़ सकी 

जो पढ़ा जाना चाहिए था 

मन जब  बहुत गीला हुआ तो एक चिट्ठी और लिख ली 

ना कल गुजर ना आज गया |

बच जाती झंझावातों से गर मोह का पहरा ना होता 

ना वो होता ना ये होता जीवन अपना गुजरा  होता |

सवाल अभी भी है-- किसे लिखी गई ये चिट्ठीयां ??

शायद अपनी आत्मा को उसका पता नहीं पता 

इसलिए डाकखाने नहीं जा सकी ये चिट्ठीयां 

नहीं जा सकी ये चिट्ठीयां ||

                                                      शकुन्तला मिश्रा 











बुधवार, 1 नवंबर 2023

चिंतन

 मन की उधेड़ बुन 

चिंतन की अवस्था एक दर्शन है 

जगत की आंधीयों से बचाव  होती है छत से 

मन की आंधीयों को बचाव चिंतन से होता है 

जीवन जब जगत का सार समझता है 

तब तक जीवन आगे जा चुका होता है 

शरीर की मशीने  थकने लगती हैं 

तन मन की ताकत घटती जाती है

 कितना अच्छा होता अगर उम्र की तरह ही 

सत को समझने की एक सीमा निर्धारित होती 

एक निश्चित काल होता 

हे  भं ते बताओ  ! दिगंत तक फैले इस मन की 

उलझनों का छोर कहाँ बांधू ?

इसी खोज मे साँझ आ जाती है 

सात वचन ,सात द्वार 

सात जनम ,सात कदम 

सात दिन ,सात अंजली इतने सारे सात !

ये सात जीवन मे कई  रंगों मे 

कई तरीकों से बारी बारी आता है 

ये कहाँ भेज दिया ?

कमाल नयन ! द्वार खुलते ही 

दो बनैली  आंखे चुभती हैं मेरे मर्म स्थल पर 

उम्र बीतती रही द्वार को खोलते 

अब तक ना भेद सकी 

अंतिम द्वार भेदन से पहले माँ  सो गई 

अब ????/


शकुन्तला  मिश्रा  



















गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

भारतीय दर्शन

 दर्शन चिंतन की श्रेष्ठ अवस्था है | यह वह ज्ञान है जी हमे तत्व से अवगत कराता हैं | मोक्ष पाना ही जीवन लक्ष्य  है 

शिक्षा पाने का अर्थ भारतीय दर्शन मे यही है और यह पूर्णतः तर्क पर आधारित है |

दुनिया मे दर्शन सबसे पहले भारत मे आया ,महाभारत  मे गीता  का उपदेश दर्शन ही है जो आत्मा से जुड़ा है |

बाहरी देशों मे दर्शन बहुत बाद मे आया जैसे -सुकरात ,प्लेटो, पाइथागोरस हुए | सुकरात को उनके तर्क सिद्ध 

सिद्धांत के कारण ही फांसी दे दी गई थी लेकिन बाद मे की वर्षों के बाद उनको माना |

दूसरी ओर भारत वैदिक काल मे ही अनेकों दार्शनिकों को जन्म दे चुका था जिनमे हमारे ऋषि मुनि तो थे ही अनेकों स्त्रियाँ भी थी | भारतीय दर्शन मे अनेक स्त्रिया भी दार्शनिक हुई हैं जिनमे मुख्य हैं  अंभरिणी जो परम तेजस्विनी है ये 

उद्घोषणा करती है -मैँ ही राष्ट्री हूँ कर्तव्य का अनुभव मैंने किया है मैँ ही जीवन रूप मे सब मे प्रविष्ट हूँ |

ब्रम्ह वादिनी गार्गी ने ऋषि यज्ञवल्क्य से तर्क करके नारी की श्रेष्ठता का अप्रतिम उदहरण दिया |इसके अलावा लोपामुद्रा ,घोषा ,अपाला ,मैत्रेयी अनेकों दर्धनिक व विदुषी स्त्रिया वैदिक काल मे हुई जो नारी चेतना की ध्वज रही हैं 

ये स्त्रिया पुरुषों की पूरक रही है प्रतिद्वंदी नहीं | 

इसके बाद सातवाहन व शुंग वंश मे नागणिका ,धारिणी ,लोखाम्बा |इस तरह हमारे देश मे स्त्रियों की समृद्ध शाली 

परंपरा रही है |

दार्शनिक स्त्रियों मे हर प्रकार का ज्ञान था वे यह भी जानती थी की रसोई से ही परिवार का स्वास्थ्य कैसे ठीक रखा जाए |

ये थी हमारे भारत की स्त्रियाँ हमारे गुरुकुलों मे भी इनको शिक्षा का बराबर अधिकार था |

जब आक्रांता आए तो यहाँ पर्दा आया ,अपनी गरिमा को बचाने के लिए जौहर अपनाना पड़ा ,शिक्षा से वंचित 

होना पड़ा हमारा शैक्षिक पतन हुआ हम अपने ज्ञान को भूलते गए ||

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2023

दरख्त की चिड़िया

 एक सूखे दरख्त पर बैठी

 एक चिड़िया ने पूछा 

कविता लिखोगी ?

मैंने कहा हाँ लिखूँगी की -

दुनियाँ निरर्थक है  यह एक बहुत बड़ा झूठ है 

वह कुछ देर मुझे देखती रही 

फिर दरख्त के  आस -पास की लताओ मे 

अपने चोंच मारने लगी 

जैसे कह रही हो चलो एकल राग मे गातें हैं 

मैं जहाँ भी हूँ . . मैँ कही भी हूँ 

तेरी याद साथ है 





सोमवार, 4 सितंबर 2023

भोर का तारा

प्रातः सूर्य देव के निकलने से पहले
 आकाश के उत्तर ओर एक अकेला 
तारा ,अन्य तारों की अपेक्षा 
अधिक चमकदार भोर मे कुछ कहता हुआ 
जैसे  कह रहा हो 
जब चारों ओर आनंद भरी शांति हो 
 शांत रहो , अच्छा सोचो ,अच्छा करो
 मैं तुम्हें कुछ देने आता हूँ |
तुम अंतर्मन से देखो तुम जो भी 
चाहते हो उसे होता हुआ देखो 
पर वही देखो जो तुम्हारे लिए संभव हो 
कर के देखो वही होगा  || 

मंगलवार, 10 मई 2022

मेरा शहर

 रोज सुबह मेरा शहर इंतजार करता है

ऐसे इन्सानो  की जो इसे  स्वच्छ रखते हैं 

यहाँ की प्र्कृती  को  सवारतें हैं 

इसे सुंदर व दर्शनीय बनाते हैं |

शहरी नियमों का पालन करतें हैं

ताकि इसका गौरव बना रहे |

मेरे शहर के बीच बहती 

गंगा से निकली गोमती कल कल बहती खुश रहती है 

इसके तट आशीष देते हैं उसको जो इसको साफ रखते हैं |

कभी शाम को आओ देखो आरती के आलोक को 

घंटे , शंख  और मंत्रो की गूंज सुनो देखो  उस अर्घ्य को 

जो सूर्य के ताप को  निचोड़ कर नदी मे विसर्जित कर देता है |

मेरे शहर का इतिहास गौरवशाली रहा है 

आक्रांताओ के खिलाफ हम आक्रोश रखते हैं 

लुटेरी संस्कृति  के खिलाफ हैं हम अपने शहर से प्रेम करतें हैं 

इस शहर मे मेरी पिछली औरअगली पीढ़ी रही है 

इस शहर सुख दुख दोनों दिये हैं ; दुख इतने की मैं पत्तियों की तरह टूटी 

पता नहीं ये शहर मेरे बारे मे क्या सोचता है 

शहर कुछ तू भी बोल 

शकुन्तला मिश्रा














सोमवार, 25 अप्रैल 2022

 एक तुम्हारा होना 

एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है 

बेजुबान छत , दीवारों को घर कर देता है |

जुबां तोतली , शब्द अनगढे 

फिर भी सार्थक लगता है 

बोल तुम्हारे बार बार सुनने को जी करता है |

आंखे बोले बैन सुरीले 

हाथ उठा कर सम्झना 

एक तुम्हारा होना सातो सुर भर देता है |

चितवन चंचल ,एक फांक नाक 

धीमी मुस्कान के बीच दो दाँत 

यह छवि तो मेरे  हृदय मे शिव बन रहती है |

शकुन्तला 


रविवार, 3 अप्रैल 2022

तुम आना

जब  मेघ घिरा अंबर हो  

विददुत मुस्कान बिछी हो 

तुम वारिद बन छा जाना 

तुम आना |

मैं श्रान्त पथिक रजनी की 

तुम निद्रा बन जीवन की 

इन पालको पर छा जाना 

तुम आना |

तुम नील कमल मधुवन के 

हिम तन मे बसो हृदय के 

जीवन स्पंद बनाना 

तुम आना |

क्षण क्षण असीम कोलाहल 

सुख दुख के कितने बादल 

वंशी स्वर बन मुसकाना 

तुम आना |

पथ देख रहे मेरे दृग 

भटक न जाए मन विहंग 

साँसो के होते आना 

तुम आना |


शकुन्तला मिश्रा 












गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

हिन्दू होना बड़ी बात है

कुछ लोग समझते हैं जैसे सब धर्म हैं उसी तरह हिन्दू भी एक धर्म है |

पर ऐसा बिलकुल नहीं हैं हिन्दू धर्म ज्ञान का भंडार हैं और सबसे बड़ी बात 

यह धर्म हमे अपने विचार रखने ,सवाल पूछने और सवाल करने की पूरी -पूरी छूट देता  है | 

हमारे ग्रंथ और वेद इंसान  को परिष्कृत बनाने की बात करते हैं इसलिए इसलिए हम कह सकते 

हैं परिष्कृत इंसान ही सनातनी है |

खुद को हम किस प्रकार जागृत करें यह उपाय हमे सनातन धर्म ही बताता है सनातन धर्म मे अपार ताकत है ,

अनंत  शक्तियां हैं |

एक जागा हुआ इंसान अपनी संकल्प शक्ति से सब कुछ कर सकता है |हमारा ढ्रर्म लकीरों पर यह निरंतर सत्य 

पर आधारित  रहा ओर आगे भी रहेगा | सनातन धर्म जीवन का संविधान है, यह खुद की उन्नति के लिए 

परिवर्तन को  मान्यता देता रहा है |

सनातन धर्म को माने वाला इंसान से देव भी बन जाता है |

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

नेता जी

सज़ा सूट बूट है 
चाल में अकड़ है 
लोगों में गुहार है 
दरवाज़े पे कार है 
कौन है ये -नेता  ।
टूटा फूटा छप्पर है 
भीतर घुसा पेट है 
गंदे -नंगे बच्चे है 
खेलने को गली -सड़क है 
दु:खो की तस्वीर है 
कौन है ये ????
नेता का निर्माता ।

शकुन्तला मिश्रा 

सोमवार, 21 नवंबर 2016

शरद पूर्णिमा

रुद्ध है आराधन का द्वार
सफल होगा कैसे आह्वान ?
मेरे उर का यह सिन्धु अथाह
जगा दी फिर दर्शन की चाह
कौन रोकेगा मेरी राह ?
ह्रदय में चलने दो यह राग
एक पल को तो जागे भाग
वेदना में भी जीवन  आज
 तपूँगी मैं पीडा के बीच
मिटाए कौन मेरा एकांत ?
वेदना के सन्मुख है  पर्व
मुझे दारुण दुःख देता आज
आज है महारास की रात
आज करना है कल्मष दाह
देवता भी देखेंगें आज
पूर्ण होंगे सबके अरमान |
चांदनी थिरक रही मधुबन
जले हैं अम्बर दीप अनंत
चीर कर आज निशा का अंध
चाँद भी उतरा धरती मध्य
उभर आया है आज ये मन्त्र
हो गया जीव आत्म निस्पंद ||

shakuntla mishra


शनिवार, 9 जुलाई 2016

ज्योति

सुना है मैं ज्योति हूँ
पर बंधी लघु वृत्त हूँ
रोज रात जलते तारे
किसे खोजते सारे ??
ले कसक लघु ह्रदय अपने
कर रही अभिसार हूँ |
रुदन ही पथ है पिया का
गूथती आंसू हार हूँ
हूँ दबी सी आग मैं
हाँ | मौन हाहाकार हूँ मैं
कौन हूँ ? क्या कहूं मै
सुन लेखनी लाचार हूँ मैं |


shakuntla

शनिवार, 13 जून 2015

एक था मन

देखना चाहूँ सब संसार 

प्राणो को प्लावित कर अपार !
सब काल वहन  कर लूँ  खुद पर ,
तैर कर जा पहुंचूं उस पार !
करुणा की धार बहाऊँगी ,
पाषाण की कारा तोड़ूँगी !
फूलों की गंध वसा लूंगी ,
रवि की किरणों पर दौडूँगी !
शिखर -शिखर को चूमूंगी ,
सारी  वसुंधरा डोलूँगी !
निज ह्रदय की बातें कह दूँगी ,
हर प्राण -गान में मैं हूँगी !
इतना सुख साध मेरे मन में ,
तारे जितने नभ मंडल में !
सब एक माला में गुथूगी ,
यौवन का वेग है प्राणो में !
आशा असीम है इस मन में ,
भावों के गीत भरे मन में !


बुधवार, 11 मार्च 2015

आस

नहीं रुकतें  हैं मेरे आस 

निरंतर करतें है उपहास 

कहें हैं -रुको गति है जहाँ 

क्या कहा ?

गति है नाम तो रुकना कहाँ ?

असंभव है ,जब तक है श्वास 

नहीं रूकती है गति कभी 

नहीं रुक सकती मेरी आस 

बड़े हैं दुःख ,वेदना यहाँ 

मगर मैं हो जाती निरुपाय 

रुके न आस ,रुके न गति 

तो कैसे रुकूँ ?कहो मैं हाय !

यही है जीवन का अधिवास 

मुझे है किन्तु त्रास में आस !


शकुन 

 

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

आज .......

आज क्यों सूना क्षतिज है
अलसाई सी प्रतिध्वनियाँ
फिरे  बावरी  पगली सी
ठंडी है तपन इस बस्ती की
 क्यों की इंधन है दृग जल का
साँसों का नित आना- जाना
ज्वाला सी लगे अनल की
 जलती हैं सुप्त ब्यथाएँ -
क्यों सुने कोई ये कथाएं ?
खुद कहती हूँ खुद सुनती हूँ
फुर्सत में अश्रु की स्याही से
चुपके -चुपके कुछ लिखती हूँ !
ये राह तुम्ही ने दिखाई थी
इस राह पे मैं चल आई ,
तुम से ही उपदेशित हूँ
फिर आज क्यों धीर विकल हूँ
मृत्यु में भी जीवन है
इस रंग में ह्रदय रंग जाए
ये डीप मेरा जल जाए !

शकुन्तला मिश्रा

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

सोच कर देखो

सोच कर देखो -
१ -सत्य की राह थोड़ी मुश्किल है पर भीड़ कम है !
इस राह पर चलकर देखो जल्दी नंबर आएगा !
२ - मैं अपेक्षा करती हूँ अपनों से -
अगर कोई बात खराब लगे मेरी ,कोई कमी दिखे मुझमे 
तो औरों  से कहने से पहले मुझे कहना ,मेरी कमी पहले मुझे 
बताना !
३ - जीवन में जो मैंने खोया अपनी अज्ञानता से खोया ,
     पर जो कुछ मैंने पाया वो तेरी कृपा से !
४ - कभी रूठ कर देखो कौन तुम्हे मनाता है -वही तुम्हारा अपना है !
५ - मेरा  मानना  हैं दर्द हमें बहुत कुछ देता है ,सिखाता है। 
     दर्द में भी एक नाम  और यश छिपा है !
६ -ज्ञान और विज्ञानं हम सब जानते हैं पर एक जो आत्मज्ञान होता है उसे कहतें हैं -
    प्रज्ञान ! यह विद्या और अविद्या से परे  है यह सम्पूर्ण समर्पित भक्ति से प्राप्त होता है !
    इसकी एक मिसाल है -महाकवि कालीदास ने  बादलों पर प्रेमिका का जो चित्र खींचा !
    

बुधवार, 17 सितंबर 2014

हिन्द-वीं

 मैं आर्यावर्त  की हिन्दी हू ँ
इक मीठी ,सरल ज़ुबान हुँ!
भारत के कण-कण में हूँ-मैं
देशज भाषा की नानी हूँ-मैं
हर भाषाओं की दादी -मैं
ब्याकरण से पहले जन्मी मैं
हर शब्दकोश हैं बाद  मेरे
अब हर बन्दा बोले  हिन्दी
कम्प्यूटर  भी लिखे हिन्दी
उर्दू ,फ़ारसी ,संस्कृत से
ख़ुद को मैंने समृद्ध किया
आन्चलिक बोलियाँ मुझमें हैं
सबकी ज़ुबान पर मैं ही हूँ
मैं हिन्दुस्तान की "तूती "हूँ
मैं थी ,मैं हूँ और मैं ही हूँ