मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

 मैँ रेगीस्तानी पेड़ 

 सुबह से शाम हो जाती है 

की आज तुम कुछ कहोगे 

बात बीच मे छोड़ कर आज तुम छुप नहीं रहोगे 

मुझे बहुत कुछ जानना है

आकाश की ऊंचाई नापनी हैं

समुद्र की गहराई भाँपनी हैं 

पत्ते सूख रहे हैं ,डाली अभी हरी है

 जीवन को जीने जैसा बनाना है 

ये रेगीस्तानी पेड़ खूब खिलना चाहता है 

कुछ बूंद पड़ने तो दो 

shakuntla mishra 



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