मैँ रेगीस्तानी पेड़
सुबह से शाम हो जाती है
की आज तुम कुछ कहोगे
बात बीच मे छोड़ कर आज तुम छुप नहीं रहोगे
मुझे बहुत कुछ जानना है
आकाश की ऊंचाई नापनी हैं
समुद्र की गहराई भाँपनी हैं
पत्ते सूख रहे हैं ,डाली अभी हरी है
जीवन को जीने जैसा बनाना है
ये रेगीस्तानी पेड़ खूब खिलना चाहता है
कुछ बूंद पड़ने तो दो
shakuntla mishra

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